सहरसा। विराटपुर पंचायत के जलसीमा गांव में स्थित रूद्रावतार भगवान शिव की पूजा-अर्चना महाभारत काल में पांडवों ने की थी। लोगों की मानें तो यह स्वयं अंकुरित महादेव के नाम से भी जाना जाता है। प्रखंड मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूरी पर अवस्थित इस मंदिर का निर्माण 1314 ई. में हुआ था। सूर्खी चूना व पत्थर से निर्मित यह प्राचीन मंदिर भारत के इतिहास के पौराणिक होने की तथ्यों की पुष्टि करता है।
यहां के लोगों की मानें तो महाभारत काल में अज्ञातवास के समय इस इलाके में पांडव रूप बदलकर रहते थे और उनलोगों ने ही भगवान शंकर की पूजा सर्वप्रथम की थी। शिवलिग को लेकर कहा जाता है कि इस जगह घनघोर जंगल हुआ करता तब जहां एक चरवाहा गाय चराने आया करता थे। गाय चराने के दौरान एक कामधेनु गाय चारा खाना के दौरान एक जगह खड़ी हो जाती तथा अपना सारा दूध गिरा देती थी। यह सिलसिला लगातार देखे जाने के बाद चरवाहा ने नजदीक जाकर देखा तो वहां एक शिवलिग पाया गया। पांडवों की याद में शिव मंदिर से थोड़ी दूर में एक समाधि भी स्थल है। जहां पर कभी एक विशाल पीपल का पेड़ हुआ करता था। मान्यता यह है कि यहां पांडव अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाकर रखते थे। परन्तु कालांतर में उस विशालकाय पेड़ के नष्ट होने से अब वहां पर केवल वह समाधि स्थल ही बची हुई है।
मंदिर के समीप पूजा के लिए एक कुआं है। कहा जाता है कि यह कुआं श्री हरि विष्णु ने भोलेनाथ को भेंट किया था। ग्रामीणों कि मानें तो इस कुएं का जलस्तर सदैव एक जैसा बना रहता है। मंदिर प्रांगण में माता पार्वती, नंदी जी, भैरव बाबा, शनि महाराज तथा बजरंगबली की प्रतिमा स्थापित है। शिवरात्रि में इस मंदिर में विशेष पूजा अर्चना की जाती है। हर वर्ष सावन की प्रत्येक सोमवारी को कांवरिया बम हजारों की संख्या में अगुवानी घाट से जल भरकर बाबा जलसीमानाथ को अर्पण करते हैं।
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— Chandra Times - Saharsa News (@Chndra_times_SH) July 30, 2024
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