मैथिली साहित्य के प्रकांड विद्वान और 'मिथिला भाषा रामायण' के रचयिता कविवर स्वर्गीय चंदा झा की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी जा रही है। उनका साहित्यिक योगदान और मैथिली भाषा के प्रति समर्पण उन्हें अमर बनाता है।
जीवन परिचय
चंदा झा का जन्म 1831 में सहरसा जिले के बड़गांव में हुआ था। उनका मूल नाम चन्द्रनाथ झा था। वे अंधराठाढ़ी (मधुबनी) के निवासी थे और उनके पिता का नाम पंडित भोला झा था। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 'कविश्वर' और 'कविचन्द्र' जैसे सम्मानजनक उपाधियों से विभूषित किया गया।
प्रमुख रचनाएँ
चंदा झा मैथिली साहित्य के समृद्ध रचना संसार के सृजक थे। उनकी कृतियों ने न केवल मैथिली भाषा को नई ऊंचाई दी, बल्कि भारतीय साहित्य में भी विशेष स्थान बनाया। उनकी प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं:
- मिथिला भाषा रामायण (1892)
- गीत शप्तशती (1902)
- संगीत सुधा (1902)
- लक्ष्मीश्वर विलास (1888)
- वाताह्न (1889)
उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित संकलन:
- महेशवाणी (1920)
- चन्द्रपदावली (1931)
- चन्द्ररचनावली (1981)
अनुवाद कार्य:
चंदा झा ने विद्यापति की संस्कृत कृति 'पुरुष-परीक्षा' का गद्य-पद्य में अनुवाद किया। यह 1888 में प्रकाशित हुई थी।
साहित्यिक योगदान
चंदा झा की रचनाओं में मिथिला की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक चेतना की झलक मिलती है। 'मिथिला भाषा रामायण' उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है, जो मैथिली साहित्य के गौरव का प्रतीक है। इसके अलावा उनकी अन्य रचनाओं में भक्ति, संगीत और नैतिक मूल्यों का समावेश है।
स्मरण और श्रद्धांजलि
1907 में चंदा झा का देहांत हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी मैथिली साहित्य में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। उनकी पुण्यतिथि पर साहित्य प्रेमी और विद्वान उन्हें याद कर उनके योगदान को नमन कर रहे हैं।
चंदा झा ने मैथिली भाषा और साहित्य को जो गौरव प्रदान किया, वह अविस्मरणीय है। उनकी लेखनी से प्रेरित होकर आने वाली पीढ़ियाँ मैथिली भाषा और उसकी संस्कृति को संरक्षित और समृद्ध करने का प्रयास करेंगी।
कविश्वर चंदा झा को शत-शत नमन!
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