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चंद्रा टाइम्स

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Bihar news : शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार की कवायद में जुटे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, चुनावी वर्ष में विपक्ष के हमलों का जवाब

पटना : बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं, और ऐसे में शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में आ गए हैं। विपक्षी पार्टियां इन मोर्चों पर सरकार को घेर रही हैं, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब इन क्षेत्रों में व्यापक सुधार करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

विपक्ष का आरोप है कि बिहार में सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति दयनीय है। शिक्षकों की भारी कमी, गिरती परीक्षा प्रणाली, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और दवाओं की किल्लत जैसे मुद्दों को लेकर सरकार सवालों के घेरे में है। लेकिन अब सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए तेजी से सुधार योजनाओं को लागू कर रही है।

शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की तैयारी

बिहार की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से विवादों में रही है। कभी शिक्षक बहाली को लेकर आंदोलन होते हैं तो कभी परीक्षा प्रणाली की कमजोरियां उजागर होती हैं। हाल ही में विपक्ष ने बिहार में शिक्षकों की भारी कमी और गुणवत्ताहीन शिक्षा प्रणाली को लेकर सरकार पर निशाना साधा था।

मुख्य चुनौतियां

*शिक्षकों की कमी – राज्य में लाखों शिक्षकों के पद खाली हैं।
*सरकारी स्कूलों की जर्जर स्थिति – कई स्कूलों में भवन, शौचालय, पीने के पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।
*बिहार बोर्ड की साख पर सवाल – परीक्षाओं में धांधली, रिजल्ट में गड़बड़ियों की शिकायतें लगातार आती रही हैं।

नीतीश सरकार के बड़े कदम

* नए शिक्षकों की बहाली – सरकार ने हाल ही में 1.70 लाख शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है।
*स्मार्ट क्लासरूम की शुरुआत – डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम शुरू किए जाएंगे।
*परीक्षा प्रणाली में सुधार – बिहार बोर्ड में डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को लागू किया जा रहा है ताकि नकल और गड़बड़ियों को रोका जा सके।
*इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार – स्कूलों में नई इमारतों, लाइब्रेरी और लैब विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।

स्वास्थ्य सेवा में सुधार के लिए नई योजनाएं

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था भी लंबे समय से सवालों के घेरे में है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं का अभाव, मशीनों की खराबी और इलाज में देरी जैसी शिकायतें आम हैं। कोरोना काल में बिहार की स्वास्थ्य सेवा की स्थिति और भी दयनीय नजर आई थी, जिसके बाद से सरकार इस दिशा में सुधार की कवायद कर रही है।

मुख्य समस्याएं

*स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी
*अस्पतालों में जरूरी दवाओं और उपकरणों की कमी
*बुनियादी ढांचे की खस्ता हालत

सरकार के सुधारात्मक कदम

➡️ डॉक्टरों की बहाली – राज्य में 5000 से अधिक डॉक्टरों और 10,000 स्वास्थ्यकर्मियों की बहाली की प्रक्रिया शुरू की गई है।
➡️ 'हर जिले में मेडिकल कॉलेज' योजना – राज्य सरकार ने घोषणा की है कि हर जिले में कम से कम एक मेडिकल कॉलेज खोला जाएगा।
➡️ मुफ्त दवा योजना – सरकारी अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त दवा उपलब्ध कराने की योजना पर तेजी से काम किया जा रहा है।
➡️ इमरजेंसी सुविधाओं का विस्तार – हर जिले में 24x7 एम्बुलेंस सेवा और टेलीमेडिसिन सुविधा को मजबूत किया जा रहा है।

विपक्ष का हमला और सरकार का जवाब

बिहार में राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों ने लगातार इन मुद्दों पर सरकार को घेरा है। विपक्ष का कहना है कि पिछले 18 वर्षों में नीतीश कुमार शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार के बड़े दावे करते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

राजद नेता तेजस्वी यादव ने हाल ही में कहा था—
"बिहार के सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत बदतर है। शिक्षकों और डॉक्टरों के पद खाली हैं, और सरकार सिर्फ कागजी योजनाएं बना रही है।"

हालांकि, सरकार का कहना है कि कोरोना महामारी के कारण विकास कार्यों में बाधा आई थी, लेकिन अब तेजी से सुधार हो रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा—
"हमारी सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। आने वाले महीनों में सभी सुधार दिखने लगेंगे।"

चुनावी रणनीति का हिस्सा?

विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार को लेकर नीतीश सरकार की सक्रियता 2025 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी हुई है। विपक्ष इन मुद्दों पर हमलावर था, इसलिए सरकार अब इन्हें सुधारने में जुटी है।

*नए शिक्षकों और डॉक्टरों की बहाली
*इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर जोर
*जनता के बीच सरकार की छवि मजबूत करने की कोशिश

ये सभी कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

क्या सुधारों से मिलेगा राजनीतिक फायदा?

बिहार में चुनावी राजनीति में शिक्षा और स्वास्थ्य अहम मुद्दे बनते जा रहे हैं। अगर सरकार इन मोर्चों पर ठोस बदलाव लाने में सफल होती है, तो यह उसे जनता का समर्थन दिलाने में मदद कर सकता है। लेकिन अगर सुधार सिर्फ कागजों तक सीमित रहे, तो विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार पर और तीखा हमला बोल सकता है।

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि—
*सरकार इन सुधारों को कितनी तेजी से लागू कर पाती है?
*क्या बिहार की जनता इन सुधारों को स्वीकार करेगी?
*विपक्ष इस मुद्दे को चुनाव में कैसे भुनाएगा?

निष्कर्ष: नीतीश सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी

शिक्षा और स्वास्थ्य के मोर्चे पर घिरी नीतीश सरकार अब सुधार के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। चुनावी साल में यह मुद्दा सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का केंद्र बना हुआ है।

अब देखने वाली बात होगी कि क्या सरकार इन सुधारों को जमीनी स्तर तक लागू कर पाएगी या फिर ये चुनावी वादे बनकर रह जाएंगे?

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