सहरसा: एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार "प्रगति यात्रा" पर निकलकर राज्य में विकास की नई गाथा लिखने का दावा कर रहे हैं, वहीं सहरसा जिले के सौर बाजार प्रखंड के रौता पंचायत का अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र विकास के इन दावों की पोल खोल रहा है। यह स्वास्थ्य केंद्र, जो हजारों लोगों के इलाज का केंद्र बनने वाला था, आज विभागीय लापरवाही और उदासीनता का शिकार होकर पशुओं का आश्रय स्थल बन गया है।
यह अस्पताल 2006 में बनने लगा था, लेकिन करीब 18 साल बाद भी यह भवन अधूरा पड़ा हुआ है। स्थानीय लोग इस स्थिति से बेहद निराश हैं। अस्पताल के भवन को कभी पूरा नहीं किया गया, और अब यह ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का केंद्र बनने के बजाय उनके लिए दर्द और पीड़ा का प्रतीक बन चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह अस्पताल शुरू हो जाता तो करीब 30,000 लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। वर्तमान में रौता पंचायत के लोग छोटी-छोटी बीमारियों से लेकर गंभीर इलाज तक के लिए 25 किलोमीटर दूर सहरसा सदर अस्पताल जाने को मजबूर हैं। इस दूरी के कारण अक्सर गंभीर स्थिति में मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यह समस्या तब और बढ़ जाती है जब बारिश या किसी आपदा के दौरान परिवहन व्यवस्था बाधित हो जाती है।
ग्रामीण बताते हैं कि यह अधूरा अस्पताल अब पूरी तरह से पशुओं का ठिकाना बन चुका है। इसमें भैंस, बकरी जैसे जानवर रहते हैं और इसके खाली हिस्सों में लोग खर-पतवार और भूसा जमा करते हैं। कभी मानव सेवा के लिए बनाया गया यह भवन अब जंगली घास और कचरे से भर चुका है।
अस्पताल के बंद रहने से न केवल रौता पंचायत बल्कि आसपास के कई गांव भी प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्र के लोगों ने कई बार प्रशासन से इसकी शिकायत की है, लेकिन उनकी गुहार अब तक अनसुनी रह गई है। यह स्थिति राज्य के विकास के बड़े दावों के विपरीत एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।
ग्रामीणों ने कहा कि अगर अस्पताल को चालू किया जाए तो लोगों को सहरसा सदर अस्पताल का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। गंभीर स्थिति में समय पर इलाज मिल सकता है और कई जानें बचाई जा सकती हैं। हालांकि, सालों से अधूरे पड़े इस अस्पताल के प्रति सरकार की उदासीनता ने लोगों को निराश कर दिया है।
आज यह अधूरा भवन न केवल सरकारी योजनाओं की विफलता की गवाही दे रहा है, बल्कि यह उन हजारों लोगों की उम्मीदों और सपनों का गला घोंटने का प्रतीक बन चुका है जो अपने क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आस लगाए बैठे थे। जब तक यह अस्पताल चालू नहीं होता, तब तक रौता पंचायत के लोग स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करते रहेंगे और विकास के बड़े दावों के बीच उनकी तकलीफें बढ़ती रहेंगी।
यह कहानी सिर्फ एक अस्पताल की नहीं है, बल्कि उन लाखों ग्रामीणों की है, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह सवाल उठाती है कि क्या विकास का असली अर्थ केवल भाषणों और कागजों तक सीमित है, या इसे जमीन पर लाना कभी प्रशासन की प्राथमिकता बनेगा?
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