मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग के मंत्री रत्नेश सादा ने मुख्यमंत्री से श्री चंडी महोत्सव को राजकीय महोत्सव का दर्जा देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि उनके विधानसभा क्षेत्र सोनवर्षा के विराटपुर गांव में स्थित मां चंडिका स्थान मंदिर उत्तर बिहार का एकमात्र पौराणिक स्थल है, जिसकी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मंत्री ने जानकारी दी कि मां चंडिका स्थान का उल्लेख 1872 ई. में ब्रिटिश कालीन रॉयल एशियाटिक सोसायटी के दस्तावेजों में भी मिलता है। इसके अलावा, सहरसा जिला गजेटियर के पृष्ठ संख्या 354 में भी इस स्थान की ऐतिहासिकता दर्ज है। यह स्थल बौद्ध और हिंदू दोनों परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
इतिहासकारों के अनुसार, चौथी शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री हवेंनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत में विराटपुर गांव में दो विशाल बौद्ध स्तूपों का उल्लेख किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पांचों पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ इस पवित्र स्थल पर कुछ समय बिताया था। इस मान्यता के कारण यह स्थल न केवल हिंदू आस्था का केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को प्रमाणित करने के लिए साल 2000 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), पटना ने यहां खुदाई की थी। इस उत्खनन में प्राप्त प्राचीन ईंटें और मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) लगभग 2000 वर्ष पुराने कुषाण कालीन बताए गए थे। यह खोज इस स्थान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को और भी प्रमाणित करती है।
मां चंडिका स्थान में सालभर प्रत्येक मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना होती है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा, दुर्गा पूजा के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसका धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्व है।
मंत्री रत्नेश सादा ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि इस स्थल की पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन की विशाल संभावनाओं को देखते हुए "श्री चंडी महोत्सव" को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिया जाए। इससे न केवल इस स्थल का संरक्षण और विकास होगा, बल्कि यह क्षेत्र पर्यटन के नए केंद्र के रूप में उभरेगा, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
इस मांग के समर्थन में स्थानीय लोग और श्रद्धालु भी उत्साहित हैं। यदि इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा मिलता है, तो न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश से श्रद्धालु और पर्यटक यहां बड़ी संख्या में आने लगेंगे, जिससे इस क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
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