सहरसा जिले के सौरबाजार थाना क्षेत्र में होली के दिन एक दर्दनाक हादसे ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। कचरा बाजार में 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला मोना देवी को एक तेज रफ्तार बाइक सवार ने टक्कर मार दी। वह पूजा के लिए केले का पत्ता तोड़ने घर से निकली थीं, लेकिन इस दुर्घटना ने उनकी जिंदगी ही छीन ली।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाइक की रफ्तार इतनी तेज थी कि टक्कर के बाद मोना देवी दूर जाकर गिरीं। आरोपी मौके पर ही बाइक छोड़कर भाग गया, लेकिन पीछे एक ऐसा दर्द छोड़ गया जिसे मोना देवी का परिवार शायद कभी भूल नहीं पाएगा।
स्थानीय लोगों ने तुरंत घायल महिला को सहरसा सदर अस्पताल पहुंचाया। वहां से गंभीर हालत देखते हुए पटना रेफर कर दिया गया। उनके भांजे बबलू कुमार ने बताया कि जान बचाने की हर संभव कोशिश की गई। लेकिन इलाज के लिए पैसों की जरूरत थी—और वह रकम इतनी बड़ी थी कि परिवार को दो लाख रुपये उधार लेने पड़े। पैसे तो इकट्ठे हो गए, इलाज भी हुआ, लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। मोना देवी जिंदगी की जंग हार गईं।
उनकी मौत की खबर सुनते ही पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी तीन संतानें हैं, लेकिन उनके सिर से मां का साया उठ गया। पहले ही उनके पति का दो साल पहले निधन हो चुका था, और अब यह हादसा हो गया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
सोचने वाली बात यह है कि जिस सिस्टम में गरीब को अपनी मां, अपनी बहन, अपने बच्चे की जान बचाने के लिए कर्ज लेना पड़े, उस सिस्टम की संवेदनहीनता पर क्या कहा जाए? क्या मोना देवी की मौत के लिए सिर्फ वह बाइक सवार जिम्मेदार है, या फिर वह व्यवस्था भी, जहां इलाज के लिए इंसान को अपनी जमा-पूंजी भी कम पड़ जाती है?
इस घटना ने सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की जिंदगी नहीं छीनी, बल्कि उस भरोसे को भी तोड़ दिया, जो आम लोगों को कानून और इंसाफ पर होता है। अब देखने वाली बात यह है कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाता है, और क्या मोना देवी के परिवार को न्याय मिल पाएगा?
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