सहरसा, 5 अप्रैल 2025 — पड़री पंचायत, जिला सहरसा निवासी शहीद बालेश्वर खां की 40वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उनके पैतृक गांव में आज एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। सीआरपीएफ के जांबाज सिपाही रहे बालेश्वर खां ने 4 अप्रैल 1985 को देश की रक्षा करते हुए आतंकियों से मुकाबला करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। चार दशकों बाद भी उनकी शहादत की गूंज न केवल उनके गांव में बल्कि पूरे क्षेत्र में आदर और गर्व के साथ सुनी जाती है।
आज की इस पुण्यतिथि पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक विशेष दल ने डीआईजी के नेतृत्व में गांव पहुंचकर शहीद को सैन्य सम्मान के साथ नमन किया। कार्यक्रम की शुरुआत शहीद के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि के साथ हुई, जिसके बाद उपस्थित जनसमूह ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
इस अवसर पर सीआरपीएफ की ओर से शहीद की पत्नी वीरांगना बुचिया देवी को सम्मानित किया गया। डीआईजी ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर, पुष्पगुच्छ और उपहार स्वरूप फल आदि भेंट किए। यह क्षण अत्यंत भावुक था, जहां न केवल शहीद का परिवार बल्कि उपस्थित हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। वीरांगना बुचिया देवी ने अत्यंत संयमित स्वर में सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि "यह सम्मान मेरे पति के बलिदान का है, और मैं पूरे देश की ओर से उन्हें नमन करती हूं।"
गांव में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। क्षेत्र की मुखिया श्रीमती किरण देवी, उपमुखिया मनोरंजन कुमार खां, मुखिया प्रतिनिधि अमन जी, पैक्स अध्यक्ष हरेंद्र खां, सरपंच दिलीप चौधरी, युवा समाजसेवी आयुष राधे जी, सुमित कुमार, निरंजन राय, युवा नेता महेश काकू, शिवम कुमार सहित अनेक सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में भाग लिया। सभी ने शहीद के जीवन और योगदान को याद करते हुए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
शहीद के भाई महेश्वर खां, जो कि वर्तमान में CISF में सेवारत हैं, इस अवसर पर अत्यंत भावुक दिखे। उन्होंने कहा, “भाईसाहब का बलिदान पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है। उनका रास्ता मुश्किल जरूर था, पर देश के लिए जीना और मरना उन्होंने हम सबको सिखा दिया। आज भी जब मैं वर्दी पहनता हूं, तो उनकी छवि मेरी आंखों के सामने होती है।”
गांव की गलियों से लेकर सभा स्थल तक "शहीद बालेश्वर खां अमर रहें", "भारत माता की जय", और "वीर शहीदों को नमन" जैसे नारों से वातावरण गूंजता रहा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर व्यक्ति में देशभक्ति का जोश और शहीद के प्रति सम्मान देखा गया। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों को प्रसाद वितरित किया गया और शहीद की आत्मा की शांति के लिए सामूहिक प्रार्थना की गई।
इस आयोजन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि भारत अपने शहीदों को कभी नहीं भूलता। बालेश्वर खां जैसे वीर सपूतों की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेंगी। उनकी शहादत इस देश की मिट्टी में समाई एक अमिट गाथा बन चुकी है, जो हर वर्ष इस दिन को गौरव, श्रद्धा और कृतज्ञता के रूप में जीवित रखती है।
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